उस दिन

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ना रात का नशा था,
ना सुबह की ताजगी
और ना ही शाम की थकान |

मैं तो भरी दोपहर में मिला था तुमसे,
यूँ ही बस बिना किसी बात के |
तुमसे मिलने की कोई ख़ास वजह लाता भी कहाँ से,
जब जिंदगी ही बड़ी बेखास सी हो गयी थी |

हमेशा से अलग कुछ शांत से थे तुम ,
जैसे मेरी ही तरह कुछ सोच रहे हो तुम भी |
तलाश रहे हो जवाब उन सवालों के,
जो अपने जवाबों की तरह खुद भी अधूरे से है |

तुम्हारी ख़ामोशी और खोयेपन में,
मुझे बिना मांगे अपने सवाल और जवाब दोनों मिल गए |
तुम अगर सागर हो कर भी निरुत्तर हो सकते हो
जीवन की अनिश्चित लहरों से,
मैं तो एक अदद इंसान हूँ, मेरी बिसात ही क्या है |

उस दिन अच्छा लगा तुम से मिल के समुन्द्र
उस दिन तुम्हारी ख़ामोशी ने सब कुछ कह दिया

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सौदेबाज़ी

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ये सोच कर कलम थामी थी कि
आज तुम पर कुछ नही लिखूंगा 
कम्भक्त आज फिर मैं खुद से ही झूठ बोल रहा था |

जब हमारा ये रिश्ता बना,
मुझे लगा था सिर्फ़ दिलों की सौदेबाज़ी हुई है  
पर ख़यालात, नींद और वक़्त कब मुफ़्त मे तुम्हारे साथ हो लिए
कुछ पता ही नही चला

 किसी माहिर चोर की तरह,
अपने गालों के हिलकोरे और आँखों की गहराई मे
जैसे छुपा कर ले गयी हो तुम ये सब |

जब कभी सोचता हूँ इस सौदेबाज़ी के बारे में,
खुद को ठगा हुआ सा पाता हूँ 
पर फिर जब तुम्हे मुस्कुराते हुए अपने पास आते देखता हूँ
तो बचे हुए खुद को भी तुम पर न्योछावर करने का मन हो उठता है |

सोचा था आज तुम पर कुछ नही लिखूंगा
कम्भक्त, कोई खुद से ही कितना ही झूठ बोलेगा |

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समझदारी

Gwalior Fort

जो दिन की हंसी को गर गौर से सुनते
रात के आंसुओं का कोलाहल जान जाते

जो नादानी को मेरी तुम समझ जाते
मेरी समझदारी पर जरूर नाज़ पाते

मेरे लाखों लफ़्ज़ों को जो कभी पड़ पाते
मेरी ख़ामोशी की गहराई में शायद डूब जाते

ना हंसी समझे , ना नादानियाँ

ना ही समझे सके तुम मेरी ख़ामोशी

बस इतना कह कर चले गए की मैं समझता नहीं ।

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नींद

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यूँ लूटा मुझे,
जैसे कोई रात, नींद चुरा ले गयी हो |
मैं तो यूँ भी तुम्हारा ही था,
देर-सवेर खुद ही खुद को दे देता |
पर तुमने मुझे चुरा कर जो छुपा दिया है,
ना मैं तुम्हे खुद में ढूँढ पाता हूँ,
ना खुद को खुद में |
बस भटकता रहता हूँ किसी पथिक की तरह
जो महज मंज़िल का रास्ता नही, मंज़िल ही भूल गया हो |
जैसे कोई रात नींद चुरा ले गयी हो
और ग़लती से निशानी मे छोड़ गयी हो ये कविता |

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आयत

किसी पत्थर पे लिखी आयत की तरह तुझे खुद मे समां लेना चाहता हूँ के जो भी इस मोहब्बत को पड़े सजदे मे सर झुका ले ।

किसी पत्थर पे लिखी आयत की तरह
तुझे खुद मे समां लेना चाहता हूँ
के जो भी इस मोहब्बत को पड़े
सजदे मे सर झुका ले ।

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खामियाँ

 

IMG_20140608_154048मेहनत की बदबू
मोहब्बत का पागलपन
सपनो की बददिमागी
और तोह्फो की फ़िज़ूलखर्ची
के खुद को बिगाड़ा भी इस नज़ाकत से है तरुण
की हर खामी से प्यार हो जाए!

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Moving places!

Indian-train-station

I have been fortunate(or maybe unfortunate) to have a mobile life till now. I changed 9 schools to clear 12 grades and have lived at more than 10 places (only places with a minimum stay of a month considered). Obviously this means, I  meet a lot of new people and considering that I am a chatter box, I do make a lot of friends. This is precisely where I have slight issues. Moving to new places does means making new friends but it also means leaving the old ones, and not just friends, leaving a place uproots you from familiarity and throws you in an unknown territory. You struggle, searching for some similarity in the new place. Searching for your old friends in new people. And getting disappointed. But then life kicks in. Like beer, you develop a taste for your new surroundings, a liking for your new friends. Realizing that each individual is different and all of them are equally awesome (yeah that annoying whining guy too) and equally horrible (yeah dear, that wonderful girl had her own issues, you will never know)
Each individual and each setting has a unique story to itself and as we gradually settle in, e too become a part of that story.
To summarize, I would quote the line my senior once said to me,

                                                 हर इंसान की एक़ कहानी होती है, बस पढ़ना आना चाहिए |

Cheers to the ever-changing life!

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